Wednesday, 27 July 2016

Top 10 :: First lady in India

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1. प्रथम महिला राज्यपाल : सरोजनी नायडू(उत्तर प्रदेश)


2.‘भारत रत्न’ से सम्मानित प्रथम महिला : इंदिरा गाँधी


3.भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति : प्रतिभा पाटिल


4.भारत की प्रथम महिला IPS : किरण बेदी


5.भारत की प्रथम महिला IAS : अन्ना जार्ज


6.भारत की प्रथम महिला मुख्यमंत्री : सुचेता कृपलानी(उत्तर प्रदेश)


7.भारत की प्रथम लोकसभा अध्यक्ष : मीरा कुमार


8.भारत की प्रथम महिला केंद्रीय मंत्री : राज कुमारी अमृत कौर


9.भारत की प्रथम महिला ‘मिस वर्ल्ड’ : कुमारी रीता फारिया


10.अशोक चक्र पाने वाली प्रथम महिला : गलोरिया बेरी
GK QUIZ SET 2
1. रैक्सिन (रेग्जिन) कृत्रिम चमड़ा किस वनस्पती पदार्थ से बनाया जाता है।
- सेल्यूलोज

2. भारी जल का अणुभार कितना होता है।
- अणुभार 20

3. ट्युबलाइट में होती है।
- पारे की वाष्प

4. देश का पहला भारी जल का संयत्र कहां पर स्थापित किया गया।
- नांगल (पंजाब)

5. राजस्थान में राष्ट्रीय राजमार्गो की सर्वाधिक लंबाई की दृष्टी से जिला है।
- जोधपुर

6. विश्वका सबसे हल्का लड़ाकू विमान है (भारतीय)।
- तेजस

7. राजस्थान की प्रथम सूती वस्त्र मिल कौनसी थी।
- दी कृष्णा मिल ब्यावर

8. राजस्थान का सबसे छोटा राष्ट्रीय राजमार्ग कौनसा है।
- एनएच 3

9. विश्व की पहली रेल सेवा किस देश में शुरू हुई।
- इंग्लैंड(1826)

10. राजस्थान में प्रथम रेल कब व कहां चलाई गई।
- 1974 में आगरा फोर्ट से बांदीकुई(भरतपुर)

11. नैनो सैकंड का मान कितना होता है।
- 10^9

12. राजस्थान में सर्वाधिक राष्ट्रीय राजमार्ग किस जिले से निकलते हैं।
- अजमेर (पांच)

13. प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना कब शुरू की गई।
- 25 दिसंबर 2000

14. राजकीय बस सेवा प्रारंभ करने वाला राजस्थान का पहला जिला है।
- टोंक (1952)

15. भारत का सबसे बड़ा रेलवे मॉडल कक्ष कहां पर है।
- उदयपुर

16. शरीर में लाल रक्त कणिकाओं का निर्माण कहां होता है।
- अस्थि मज्जा

17. हिमोफिलिया,मांगोलिज्म, वर्णाधता किस प्रकार के रोग हैं।
- आनुवंशिक रोग

18. पक्षियों एवं उनके स्वभाव का अध्ययन करने वाले विज्ञान को कहते हैं।
- आरनिथोलॉजी

19. मानव जाति का अध्ययन करने को कहते हैं।
- एंथ्रोपोलॉजी

20. छिपकलियों का अध्ययन करने वाला विज्ञान है।
- सौरालॉजी
G K QUIZ SET

1. तुर्की का पिता के उपनाम से किसे जाना जाता है।
- मुस्तफा कमालपाशा
2. रेड इंडियन कहां के निवासी थे।
- अमेरिका
3. किस एक्ट में लड़की के लिए विवाह की उम्र 18 वर्ष निर्धारित की गई।
- शारदा एक्ट (1930)
4. राजा राम मोहन राय को राजा की उपाधि किसने प्रदान की।
- अकबर द्वितीय
5. मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे आजम की उपाधी किसने प्रदान की।
- महात्मा गांधी
6. कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान किस राज्य में है।
- उत्तराखंड
7. महलों का शहर के नाम से कौनसा शहर जाना जाता है।
- कोलकाता
8. गंगासागर परियोजना किस नदी पर स्थित है।
- चंबल (मध्यप्रदेश)
9. अखबारी कागज बनाने का सरकारी कारखाना कहां पर है।
- नेपानगर (मध्य प्रदेश)
10. भारत में कागज बनाने का पहला कारखाना कहां पर खोला गया।
- ट्रंकवार में (1716)
11. किसके वेतन पर आयकर नहीं लगता है।
- राष्ट्रपति
12. मंत्रिपरिष्द सामूहिक रूप से किसके प्रति उत्तरदायी होती है।
- लोक सभा
13. किस राष्ट्रपति के निर्वाचन के समय दूसरे चक्र की मतगणना करनी पड़ी।
- वी.वी. गिरि
14. संविधान के किस अनुच्छेद में प्रधानमंत्री की नियुक्ति वर्णित है।
- अनुच्छेद 75
15. राज्य सभा की सदस्यता के लिए न्यूनतम उम्र सीमा कितने वर्ष है।
- 30 वर्ष
16. वर्तमान में संघ सूची में कितने विषय सम्मिलित है।
- 98
17. वर्तमान में राज्य सूची में कितने विषय शामिल हैं।
- 62
18. वर्तमान में समवर्ती सूची में कितने विषय हैं।
- 52
19. रियासतों को भारत में सम्मिलित करने के लिए किसके नेतृत्व में रियासती मंत्रालय बनाया गया।
- सरदार बल्लभ भाई पटेल
20. दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का दर्जासंविधान के किस संशोधन के द्वारा दिया गया है।
- संविधान के 69वें संशोधन में


Image copyrightB

दुनिया में सबसे ज़्यादा नमी (आद्रता) वाली जगह कौन सी है?
कुछ लोग इसका जवाब मारिना ट्रेंच दे सकते हैं जो महासागरों में सबसे गहरी जगह है और जिसके ऊपर करीब 10 हज़ार मीटर पानी मौजूद है.
लेकिन अगर ज़मीन पर सबसे ज़्यादा नमी वाली जगह की बात हो तो इसका जवाब इतना आसान नही है.
दुनिया में सबसे ज़्यादा नमी वाले जगह के तौर पर गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भारत के मेघालय में मासिनराम का नाम दर्ज है. यहां बंगाल की खाड़ी की वजह से काफी ज़्यादा नमी है और 1491 मीटर की ऊंचाई वाले खासी पहाड़ियों की बदौलत यह नमी संघनित भी हो जाती है.
यहां औसतन सालाना बारिश 11,871 मिलीमीटर होती है. ऐसी बारिश में रियो डि जेनेरियो स्थित क्राइस्ट की 30 मीटर ऊंची मूर्ति के घुटनों तक पानी होगा.
इस इलाके में काफी ज़्यादा हरियाली है. मुग्ध करने वाले जलप्रपात हैं और उससे गिरने वाले झरनों के नीचे आकर्षक पहाड़ी गुफाएं हैं. इससे 10 मील पूर्व में स्थित है चेरापूंजी.

सोहरा में रिकॉर्डतोड़ बारिश



Image copyrightDANIEL J. RAO ALAMY

स्थानीय लोग चेरापुंजी को सोहरा नाम से जानते हैं. यह दुनिया की दूसरा सबसे नमी वाली जगह है.
यहां औसतन बारिश मासिनराम से 100 मिलीमीटर कम होती है. हालांकि कई बार (कुछ महीने और सालों के दौरान) यह दुनिया का सबसे नमी वाला स्थान भी बन जाता है.
जुलाई, 1861 में यहां 9,300 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी. बीते अगस्त से अब तक चेरापूंजी में 26,470 मिलीमीटर की रिकॉर्ड तोड़ बारिश दर्ज हो चुकी है.
दुनिया भर में सबसे ज़्यादा बारिश वाली ये दोनों जगहें मेघालय में मौजूद हैं. ये पूरा इलाका हमेशा बादलों से घिरा रहता है.
यहां लोग बेंत से बने छाते जिन्हें कनूप कहते हैं, साथ में रखते हैं ताकि शरीर हमेशा ढंका रहे और वो बारिश के दौरान भी लगातार काम करते रहें.
उनका ज्यादातर समय वहाँ बारिश से टूटी फूटी सड़कों की मरम्मत करने और नई सड़कें तैयार करने में लगता है.

मुश्किल भरा जीवन यापन



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लगातार होने वाली भारी बारिश की वजह से इस इलाके में खेती करना असंभव है. ऐसे में लोग ड्रायर से सुखाए सामान तिरपाल से लपेट कर बाज़ारों में बेचे जाते हैं.
इसका अलावा इलाके में बने पुलों को सुरक्षित रखने में काफी मुश्किल होती है, जहां परंपरागत सामान जल्दी ही सड़ गल जाता है. ऐसे में लोग पेड़ों की जड़ों को आपस में बांधकर पुल बनाते हैं.
भारत में रबर के पौधे काफी मज़बूत होते हैं, उनकी जड़े काफी लचीली भी होती है. इसके जरिए स्थानीय लोग नदी नालों को पार कर जाते हैं. इसके अलावा बांस के पुल भी बनाए जाते हैं.
पेड़ की जड़ों और लचीले तनों के बीच बांस रखकर भी पुल बनाए जाते हैं. बाद में बांस के गल जाने पर भी पुल कायम रहते हैं. ऐसे में एक पुल को तैयार होने में 10 साल तक का समय लगता है.
लेकिन ऐसे पुल फिर सैकड़ों साल तक चलते हैं. इस इलाके में ऐसा एक पुल तो पांच सौ साल पुराना बताया जाता है.
पहाड़ियों के बीच बसा ये इलाका ऐतिहासिक तौर पर दुनिया भर में सबसे ज़्यादा बारिश के लिए जाना जाता है, पर पिछले कुछ समय से कहा जा रहा है कि दुनिया में सबसे नमी वाला इलाका कहीं और हो सकता है.

कोलंबिया से मिलती चुनौती

मेघालय की इन जगहों को कोलंबिया की दो जगहों से चुनौती मिल रही है, लेकिन तकनीकी तौर पर इनकी तुलना भारत के दोनों जगहों से नहीं हो सकती.
उत्तरी पश्चिमी कोलंबिया के शहर लाइओरो में 1952 से 1954 के बीच सालाना बारिश 13,473 मिलीमीटर दर्ज हुई थी. यह मासिनराम में होने वाली औसत बारिश से ज्यादा है.
लेकिन उस समय बारिश मापने के लिए इस्तेमाल पैमाने अब मान्य नहीं हैं.


Image copyrightCHRISTIAN WERTHENBACH ALAMY

मौसम इतिहासकार क्रिस्टोफर सी बर्ट के मुताबिक कोलंबिया का प्यूर्टो लोपाज दुनिया में सबसे ज़्यादा नमी वाली वाली जगह है. वे कहते हैं, "असल में दुनिया में सबसे ज़्यादा नमी वाली जगह कोलंबिया में प्यूर्टो लोपाज है जहां औसतन 12,892 मिलीमीटर बारिश होती है."
बर्ट के मुताबिक पिछले 50 सालों से यहां की बारिश को मापा जाता है, लेकिन बीच के कई महीनों के आंकड़े ग़ायब हैं.
इसलिए प्यूर्टो लोपाज में होने वाली बारिश के आंकड़े पूरी तरह मुकम्मल नहीं हैं, ऐसे में बीते 30 सालों से जिन जगहों के आंकड़े तैयार हुए हैं, उनसे इनकी तुलना नहीं हो सकती.
बर्ट कहते हैं, "जितने समय के आंकड़े मौजूद हैं और जितने समय के पूरे साल भर के आंकड़े मौजूद हैं, उसके आधार पर ही मैं भरोसे से कह सकता हूं कि प्यूर्टो लोपाज में सामान्य तौर पर मासिनराम से ज़्यादा बारिश होती है."
कोलंबियाई शहर में साल भर बारिश होती है, क्योंकि यह एंडीज पर्वत श्रृंखलाओं में बसा हुआ है.

क्यों होती है इतनी बारिश?



Image copyrightNEIL MCALLISTER ALAMY

बर्ट कहते हैं, "प्रशांत महासागर की ओर से यहां लगातार नमी का दबाव रहता है और उस दबाव को पर्वत रोकते हैं जिसके चलते प्यूर्टो लोपाज में काफ़ी ज़्यादा बारिश होती है. मुझे लगता है कि औसतन यहां सालाना 320 से ज़्यादा दिनों की बारिश होती है. यहां साल दर साल एकसमान बारिश होती रहती है."
ऐसे में एक बात ध्यान रखने योग्य है, कि औसत बारिश और अधिकतम बारिश में फर्क होता है.
महज दो दिनों के अंदर भारत में सबसे ज़्यादा बारिश रिकॉर्ड की गई. 2014 की गर्मियों में विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने आंकड़ों के साथ बताया कि चेरापूंजी में 15 और 16 जून, 1995 को 2,493 मिलीमीटर बारिश हुई थी.
मासिनराम की रिकॉर्डतोड़ बारिश में से 90 फ़ीसदी बारिश महज छह महीनों के भीतर हो जाती है, मई से अक्तूबर के बीच. यहां जुलाई में सबसे ज़्यादा बारिश होती है. औसतन यहां इस महीने में 3500 मिलीमीटर बारिश होती है.


Image copyrightHEMIS ALAMY

दिसंबर से फरवरी के बीच यहां बहुत कम बारिश होती है. हालांकि यह दुनिया का सबसे ज़्यादा नमी और बारिश वाला इलाका है, लेकिन यहां के लोगों को पीने के पानी की किल्लत से भी जूझना पड़ता है.

Monday, 4 January 2016

India’s One Of Best Tourist Place – Goa History In Hindi ( गोवा इतिहास एवम् परिचय )


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India’s One Of Best Tourist Place – Goa History ( गोवा इतिहास एवम् परिचय )

केरल के एकदम पश्चिम दिशा में समुद्र में स्थित यह द्वीप लक्षद्वीप पुकारा जाता है। जिसकी राजधानी कवरती है। यहां की जनसंख्या 2001 13,43,998 है। क्षेत्रफल 37,02 वर्ग किलोमीटर तािा जनसंख्या घनत्व 363 वर्ग किलोमीटर है।
गोवा में सामान्यतः गुजराती, कोंकणी, मराठी, पुर्तगाली व अंग्रेजी भाषाएं बोली जाती है। यहां जून से अक्टूबर तक मानसून का मौसम रहता है।
विशिष्टि ऐतिहासिक जानकारी
ईसा पूर्व तीसरी सदी में मौर्य साम्राज्य काल से गोवा का इतिहास ज्ञात होता है। उस सदी में कोंकण क्षेत्र में सातवाहन राजवंश के शासक कृष्ण शातकर्णी का शासन था। गोवा का पुरातन नाम गायक पट्टण अथवा गोम्नत था। गोवा सन् 1471 से बहमनी शासकों के नियंत्रण में था किन्तु 1489 में बीजापुर के शासक आदिलशाह ने इस पर अधिकार कर लिया ।
पुर्तगाल के साहसी शासक अल्बुकर्क ने 25 नवम्बर 1510 में आदिलशाह से गोवा को छीन  लिया और उसी दिन सेन्ट कैथरीन को सौंप दिया ।
यहां सतारी के राने लोगों ने सन् 1755 से 1824 तक चैदह बार विद्रोह किया था जिसे पुर्तगालियों ने हर दफा कुचल दिया। 1826 ई में गोवा के निवासी लुईस फ्रांसिस्कों ने प्रथम बार पूर्ण स्वाधीनता का स्वर बुलन्द किया। 18 जून 1946 को आजादी का आंदोलन एक खास दौर में जा पहुंचा। सन् 1954 में यह आंदोलन तब पहली सफलता पा सका, जब दमन के निकट दादरा व नागर हवेली मुक्त करा ली ािी।
मांडवी नदी के किनारे पर उपस्थित शहर पणजी गोवा जी राजधानी है। पणजी में बीजापुर के नवाब का पुराना महल भी है।
एक मोहक और विख्यात पर्यटन केन्द्र डोनापाला बीच भी यहां पर है। गोवा की राजधानी पणजी से केवल 18 किलोमीटर दूर अजुना बीच स्थित हैं अंजुनाबीच चपोरा किले के बहुत निकट है। यहीं निकट ही अपने आकर्षक गुम्बदों के लिये विख्यात अल्बु कर्क महल है। यह सन् 1920 में निर्मित किया गया था।
उतरी गोवा में आरामबोल बीच स्थित है। दक्षिण गोवा का एक बीच बेतुल बीच भी प्रसिद्ध है। इसकी यह ख्याति उसकी लंबाई और दोनों तरफ पसरे पाम वृक्षों के कारण है। मडगांव में बेतुल बीच का फासला 20 किलोमीटर है।
पणजी से 28 किलोमीटर दूर पर पटनेम स्थित है। जहां श्री भगवती मंदिर बना है। यह 500 वर्ष पुराना है। गोवा का सबसे सुंदर श्रीमंगेश मंदिर करीब चार सौ वर्ष प्राचीन है।
बाम जीसस चर्च 16वीं सदी में निर्मित किया गया था। गोवा का सबसे पुराना गिरजाघर चर्च आॅफ अवर लेडी आॅफ रोजरी है। सन् 1590 में पुर्तगाली अलफांसो डि अल्बुकर्क के गोवा आने के समय के विवरण इस गिरजाघर में आज तक सहेजे गये है।
मडगांव सैंतीस किलोमीटर की दूरी पर अगोंडा बीच शांतिप्रिय पर्यटकों के मध्य एक पसंदीदा बीच है। पणजी से मात्र तीन किलोमीटर के फासले पर मीरामार बीच है। इसे गोल्डन बीच नाम से भी पुकारा जाता है।
75 वर्षों में बनकर तैयार हुआ कैथेड्रल चर्च पुराने गोवा में बना है। बामजीसस चर्च के पास स्थित इस चर्च का निर्माण 450 साल पहले किया गया था। यहां स्थित स्वर्ण रंग घंअी गोवा की बड़ी घंटियों में मानी जाती है। इस समेत इस चर्च में पांच सुन्दर घंटियां हैं।
अन्य दर्शनीय स्थल –
वन्य जीव अभ्यारण्य (बोंडला), अगोडा का किला, मेयम झील, केसरवाल प्रताप, दूधसागर प्रताप व गोवा संग्रहालय भी यहां के आकर्षण में शामिल है।
राजस्थान की प्रमुख झीलें



राजस्थान में मीठे पानी और खारे पानी की दो प्रकार की झीलें हैं। खारे पानी की झीलों से नमक तैयार किया जाता है। मीठे पानी की झीलों का पानी पीने एंव सिंचाई के काम में आता है।
मीठे पानी की झीले -
राजस्थान में मीठे पानी की झीलों में जयसमन्द, राजसमन्द, पिछोला, आनासागर, फाईसागर, पुष्कर, सिलसेढ, नक्की, बालसमन्द, कोलायत, फतहसागर व उदयसागर आदि प्रमुख है।

१) जयसमन्द - यह मीठे पानी की सबसे बड़ी झील है। यह उदयपुर जिले में स्थित है तथा इसका निर्माण राजा जयसिंह ने १६८५-१६९१ ई० में गोमती नदी पर बाँध बनाकर करवाया था। यह बाँध ३७५ मीटर लंबा और ३५ मीटर ऊँचा है। यह झील लगभग १५ किलोमीटर लंबी और ८ किलोमीटर चौड़ी है। यह उदयपुर से ५१ किलोमीटर दूर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। इसमें करीब ८ टापू हैं जिसमें भील एंव मीणा जाति के लोग रहते हैं।
इस झील से श्यामपुर तथा भाट नहरे बनाई गई हैं। इन नहरों की लंबाई क्रमश: ३२४ किलोमीटर और १२५ किलोमीटर है।
इस झील में स्थित बड़े टापू का नाम 'बाबा का भागड़ा' और छोटे टापू का नाम 'प्यारी' है। इस झील में ६ कलात्मक छतरियाँ एंव प्रसाद बने हुए हैं जो बहुत ही सुन्दर हैं। झील पहाड़ियों से घिरी है। शांत एंव मनोरम वातावरण में इस झील का प्राकृतिक सौंदर्य मनोहरी है जो पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केन्द्र है।

२) राजसमन्द - यह उदयपुर से ६४ किलोमीटर दूर कांकरौली स्टेशन के पास स्थित है। यह ६.५ किलोमीटर लंबी और ३ किलोमीटर चौड़ी है। इस झील का निर्माण १६६२ ई० में उदयपुर के महाराणा राजसिंह के द्वारा कराया गया। इसका पानी पीने एंव सिचाई के काम आता है। इस झील का उत्तरी भाग नौ चौकी के नाम से विख्यात है जहां संगमरमर की २५ शिला लेखों पर मेंवाड़ का इतिहास संस्कृत भाषा में अंकित है।

३) पिछोला झील - यह उदयपुर की सबसे प्रसिद्ध और सुन्दरतम् झील है। इसके बीच में स्थित दो टापूओं पर जगमंदिर और जगनिवास दो सुन्दर महल बने हैं। इन महलों का प्रतिबिंब झील में पड़ता है। इस झील का निर्माण राणा लाखा के शासन काल में एक बंजारे ने १४वीं शताब्दी के अंत में करवाया था। बाद में
इसे उदय सिंह ने इसे ठीक करवाया। यह झील लगभग ७ किलोमीटर चौड़ी है।

४) आनासागर झील - ११३७ ई० में इस झील का निर्माण अजमेर के जमींदार आना जी के द्वारा कराया गया। यह अजमेर में स्थित है। यह दो पहाड़ियों के बीच में बनाई गई है तथा इसकी परिधि १२ किलोमीटर है। जहाँगीर ने यहाँ एक दौलत बाग बनवाया तथा शाहजहाँ के शासन काल में यहां एक बारादरी का निर्माण हुआ। पूर्णमासी की रात को चांदनी में यह झील एक सुंदर दृश्य उपस्थित करती है।

५) नक्की झील - यह एक प्राकृतिक झील है तथा यह माउंट आबू में स्थित है। यह झील लगभग ३५ मीटर गहरी है। यह झील का कुल क्षेत्रफल ९ वर्ग किलोमीटर है। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण पर्यटकों का मुख्य केन्द्र है।

६) फाई सागर - यह भी एक प्राकृतिक झील है और अजमेर में स्थित है। इसका पानी आना सागर में भेज दिया जाता है क्योंकि इसमें वर्ष भर पानी रहता है।
७) 
पुष्कर झील - यह अजमेर से ११ किलोमीटर दूर पुष्कर में स्थित हैं। इस झील के तीनों ओर पहाड़ियाँ है तथा इसमें सालों भर पानी भरा रहता है। वर्षा ॠतु में यहां का प्राकृतिक सौंदर्य अत्यंत मनोहारी एंव आकर्षक लगता है। झील के चारों ओर स्नान घाट बने है। यहां ब्रह्माजी का मंदिर है। यह हिन्दुओं का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। यहां हर साल मेला लगता है।

८) सिलीसेढ़ झील - यह एक प्राकृतिक झील है तथा यह झील दिल्ली-जयपुर मार्ग पर अलवर से १२ किलोमीटर दूर पश्चिम में स्थित है। यह झील सुंदर है तथा पर्यटन का मुख्य स्थल है।

९) बालसमन्द झील - यह झील जोधपुर के उत्तर में स्थित है तथा इसका पानी पीने के काम में आता है।

१०) कोलायत झील - यह झील कोलायत में स्थित है जो बीकानेर से ४८ किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। यहां कपिल मुनि का आश्रम है तथा हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा के दिन मेला लगता है।

११) फतह सागर - यह पिछोला झील से १.५ किलोमीटर दूर है। इसका निर्माण राणा फतह सिंह ने कराया था। यह पिछोला झील से निकली हुई एक नहर द्वारा मिली है।

१२) उदय सागर - यह उदयपुर से १३ किलोमीटर दूर स्थित है। इस झील का निर्माण उदयसिंह ने कराया था।

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खारे पानी की झील
१) साँभर झील - यह राजस्थान की सबसे बड़ी झील है। इसका अपवाह क्षेत्र ५०० वर्ग किलोमीटर में फैला है। यह झील दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम की ओर लगभग ३२ किलोमीटर लंबी तथा ३ से १२ किलोमीटर तक चौड़ी है। ग्रीष्मकाल में वाष्पीकरण की तीव्र दर से होने के कारण इसका आकार बहुत कम रह जाता है। इस झील में प्रतिवर्ग किलोमीटर ६०,००० टन नमक होने का अनुमान है। इसका क्षेत्रफल १४५ वर्ग किलोमीटर है। इसके पानी से नमक बनाया जाता है। यहां सोड़ियम सल्फेट संयंत्र स्थापित किया गया है जिससे ५० टन सोड़ियम सल्फेट प्रतिदिन बनाया जाता है। यह झील जयपुर और नागौर जिले की सीमा पर स्थित है तथा यह जयपुर की फुलेरा तहसील में पड़ता है।

२) डीड़वाना झील - यह खारी झील नागौर जिले के डीड़वाना नगर के समीप स्थित है। यह ४ किलोमीटर लंबी है तथा इससे भी नमक तैयार किया जाता है। डीड़वाना नगर से ८ किलोमीटर दूर पर सोड़ियम सल्फेट का यंत्र लगाया गया है। इस झील में उत्पादित नमक का प्रयोग बीकानेर तथा जोधपुर जिलों में किया जाता है।

३) पंचभद्रा झील - बाड़मेर जिले में पंचभद्रा नगर के निकट यह झील स्थित है। यह लगभग २५ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर स्थित है। यह झील वर्षा के जलपर निर्भर नही है बल्कि नियतवाही जल श्रोतों से इसे पर्याप्त खारा जल मिलता रहता है। इसी जल से नमक तैयार किया जाता है जिसमें ९८ प्रतिशत तक सोड़ियम क्लोराइड़ की मात्रा है।

४) लूणकरण सागर - यह बीकानेर जिले के उत्तर-पूर्व में लगभग ८० किलोमीटर दूर स्थित है। इसके पानी में लवणीयता की कमी है अत: बहुत थोड़ी मात्रा में नमक बनाया जाता है। यह झील ६ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली है।
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जिलानुसार राजस्थान की झीलें

जिला झीलें/बांध
अजमेर - आना सागर, फाई सागर, पुष्कर, नारायण सागर बांध
अलवर - राजसमन्द, सिलीसेढ़
बाँसवाड़ा - बजाज सागर बांध, कहाणा बांध
भरतपुर - शाही बांध, बारेण बांध, बन्ध बरेठा बांध
भीलबाड़ा - सरेपी बांध, उन्मेद सागर, मांड़लीस, बखड़ बांध, खाड़ी बांध, जैतपुर बांध
बीकानेर - गजनेर, अनुप सागर, सूर सागर, कोलायतजी
बूंदी - नवलखाँ झील
चित्तौड़गढ़ - भूपाल सागर, राणा प्रताप सागर
चुरु - छापरताल
धौलपुर - तालाबशाही
डूंगरपुर - गौरव सागर
जयपुर - गलता, रामगढ़ बांध, छापरवाड़ा
जैसलमेर - धारसी सागर, गढ़ीसर, अमर सागर, बुझ झील
जोधपुर - बीसलपुर बांध, बालसमन्द, प्रताप सागर, उम्मेद सागर, कायलाना, तख्त सागर, पिचियाक बांध
कोटा - जवाहर सागर बांध, कोटा बांध
पाली - हेमा बास बांध, जवाई बांध, बांकली, सरदार समन्द
सिरोही - नक्की झील (आबू पर्वत)
उदयपुर - जयसमन्द, राजसमन्द, उदयसागर, फतेह सागर, स्वरुप सागर और पिछोला।

Sunday, 3 January 2016

चित्तौड़गढ़


चित्तौड़गढ़ शहर राजस्थान में स्थित है जो लगभग 700 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है और अपने शानदार किलों, मंदिरों, दुर्ग और महलों के लिए जाना जाता है।
चित्तौड़गढ़ तस्वीरें, राणा कुंभा पैलेस, पैलेस
Image source: commons.wikime

पौराणिक कथाओं में चित्तौड़ग
इस शहर के योद्धाओं की वीरता की कहानियों को भारत के इतिहास में सम्मानजनक स्थान प्राप्त है। एक लोककथा के अनुसार हिंदू महाकाव्य के एक महत्वपूर्ण चरित्र और पांडवों में से एक, भीम ने एक साधु से अमरत्व का रहस्य जानने के लिए इस स्थान की यात्रा की थी। हालांकि वह अपनी अधीरता के कारण अपने प्रयास में सफल नहीं हो सका। उसने कुंठा और क्रोध में जमीन पर पैर पटका जिसके कारण इस स्थान पर एक जलाशय बना जो भीम लात के नाम से जाना जाता है।

चित्तौड़गढ़ और उसके आसपास

इस शहर का प्रमुख आकर्षण चित्तौड़गढ़ किला है, जो 180 मीटर ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। इस किले में कई स्मारक है जिनमें से प्रत्येक के निर्माण के पीछे कुछ कहानी है। महाराणा फ़तेह सिंह द्वारा बनवाया गया फतेह प्रकाश महल एक सुंदर ऐतिहासिक स्थान है। महल के अंदर आपको भगवान गणेश की एक सुंदर मूर्ति, बड़ा फ़व्वारा और सुंदर भित्ति चित्र मिलेंगे जो विगत युग की कला को दर्शाते हैं। इसके अलावा यहाँ इस क्षेत्र में अनेक धार्मिक केंद्र हैं जैसे सांवरियाजी मंदिर, तुलजा भवानी मंदिर, जोगिनिया माता जी मंदिर और मत्री कुंडिया मंदिर।
प्रकृति का पूर्ण रूप से आनंद उठाने के लिए पर्यटक बस्सी वन्य जीवन अभ्यारण्य का भ्रमण कर सकते हैं जो 50 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इसके अलावा सीतामाता अभ्यारण्य और भैन्स्रोगढ़ वन्य जीवन अभ्यारण्य भी अपनी जीवों और वनस्पतियों के लिए पर्यटकों में लोकप्रिय हैं। वे पर्यटक जो इस शहर के बारे में और इसकी संस्कृति के बारे में अधिक जानना चाहते हैं वे पुरातत्व संग्रहालय (आरर्कियोलॉजिकल म्यूज़ियम) का भ्रमण कर सकते हैं जहाँ सुंदर मूर्तियाँ, दुर्लभ चित्र मूर्तियाँ और प्राचीन काल के भित्ति चित्र देखे जा सकते हैं। संग्रहालय में पाई जाने वाली कुछ मूर्तियाँ गुप्त और मौर्य राजवंशों से जुड़ी हुई हैं।
यदि समय अनुमति दे तो पर्यटक बीजापुर में स्थित एक पुराने किले का भ्रमण कर सकते हैं जिसे अब एक होटल में परिवर्तित कर दिया गया है। प्रतापगढ़ के पास स्थित 16 वीं शताब्दी का देवगढ़ किला भी एक प्रमुख पर्यटन स्थल है।यह स्थान अनेक मंदिरों और महलों के लिए जाना जाता है।
मेनल एक छोटा सा शहर है जो चित्तौड़गढ़ से 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अपने परिदृश्य और मंदिरों की वास्तुकला के कारण यह स्थान “मिनी खजुराहो” के नाम से भी जाना जाता है। इस स्थान पर खुदाई के बाद कई बौद्ध मंदिर मिले जिमें से 12 वीं शताब्दी का मंदिर प्रमुख है। अपने सुंदर दृश्यों के कारण यह स्थान एक प्रमुख पिकनिक स्थल बन गया है।
इसके अल्वा पर्यटक गायमुख कुंड के भ्रमण की योजना भी बना सकते हैं जिसका आकार इसके नाम के अनुसार गाय के मुख के समान है। इस जलाशय के पास रानी बिंदर टनल है जो शहर का प्रमुख आकर्षण भी है।

चित्तौड़गढ़ पहुँचना

चित्तौड़गढ़ का निकटतम हवाई अड्डा डबोक हवाई अड्डा है जिसे महाराणा प्रताप हवाई अड्डे के नाम से भी जाना जाता है, जो 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह हवाई अड्डा सभी प्रमुख भारतीय शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। चित्तौड़गढ़ का रेलवे स्टेशन महत्वपूर्ण शहरों जैसे अजमेर, जयपुर, उदयपुर, कोटा और नई दिल्ली से जुड़ा हुआ है। इस शर तक रास्ते द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है और राज्य परिवहन और निजी बस दोनों प्रकार की सेवा यहाँ उपलब्ध है।

चित्तौड़गढ़ में मौसम

गर्मियों में इस स्थान का मौसम बहुत गर्म होता है और इस दौरान अधिकतम तापमान 44 डिग्री सेल्सियस तक जाता है। मानसून के दौरान रुक रुक कर होने वाली वर्षा के कारण हवा नम होती है। इस क्षेत्र में प्रतिवर्ष औसत 60 सेमी. से 80 सेमी. तक वर्षा होती है। इस स्थान की यात्रा के लिए ठंड का मौसम सबसे उपयुक्त माना जाता है क्योंकि तापमान 11 डिग्री सेल्सियस और 28 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है। 
राणा कुम्भ महल एक ऐतिहासिक स्मारक है जहाँ राजपूत राजा महाराणा कुम्भ ने अपना शाही जीवन बिताया। यह शानदार किला 15 वीं शताब्दी में बना और यह भारत की बेहतरीन संरचनाओं में से एक है। यह राजपूत वास्तुकला का प्रतीक है और पर्यटकों के बीच बहुत लोकप्रिय है।
चित्तौड़गढ़ तस्वीरें, राणा कुंभा पैलेस, पैलेस
Image source:commons.wikimedia.
ऐसा माना जाता है कि इस स्थान में कई भूमिगत कोठियां हैं जहाँ रानी पद्मिनी ने अपने प्रान्त की महिलाओं के साथ जौहर (दुश्मन के द्वारा किये जाने वाले अपमान से अपने आप को बचाने के लिए किया जाने वाला मानद आत्मदाह) किया था। इस मंदिर के पास एक प्राचीन मंदिर है जो भगवान शिव को समर्पित है। इस महल के परिसर में प्रतिदिन पर्यटकों के लिए एक लाइट और ध्वनि का शो आयोजित किया जाता है

Thursday, 31 December 2015

राणा सांगा से वीर थे, कुम्भा का विजय स्तम्भ देख। 
टूटे हुए इन खण्डहरों में सोती हुई कहानियाँ ।


राणा मोकल के पश्चात् उसका ज्येष्ठ पुत्र कुम्भकर्ण (कुम्भा Rana Kumbha) वि.सं. १४९० (ई.सं. १४३३) में चित्तौड़ के राज्य सिंहासन पर बैठा। कुम्भा राजाओं का शिरोमणि, विद्वान, दानी और महाप्रतापी था। राणा कुम्भा ने गद्दी पर बैठते ही सबसे पहले अपने पिता के हत्यारों से बदला लेने का निश्चय किया। राणा मोकल की हत्या चाचा, मेरा और महपा परमार ने की थी। वे तीनों दुर्गम पहाड़ों में जा छिपे। इनको दण्डित करने के लिए रणमल राठौड़ (मण्डर) को भेजा। रणमल ने इन विद्रोहियों पर आक्रमण किया। रणमल ने चाचा और मेरा को मार दिया, किन्तु महपा चकमा देकर भाग गया। चाचा का पुत्र और महपा ने भागकर माण्डू (मालवा) के सुलतान के यहाँ शरण ली। राणा ने अपने विद्रोहियों को सुपुर्द करने के लिए सुल्तान के पास सन्देश भेजा। सुल्तान ने उत्तर दिया कि मैं अपने शरणागत को किसी भी तरह नहीं छोड़ सकता। अतः दोनों में युद्ध की सम्भावना हो गई। 
वि.सं. १४९४ (ई.स. १४३७) में सारंगपुर के पास मालवा सुल्तान महमूद खिलजी पर राणा कुम्भा ने आक्रमण किया। सुल्तान हारकर भाग गया और माण्डू के किले में शरण ली। कुम्भा ने माण्डू पर आक्रमण किया। अन्त में सुल्तान पराजित हुआ और उसे बन्दी बनाकर चित्तौड़ ले आए। उसे कुछ समय कैद में रख कर क्षमा कर दिया। इस विजय के उपलक्ष में राणा कुम्भा ने चित्तौड़ दुर्ग में कीर्ति स्तम्भ बनवाया । 

राणा कुम्भा दयालु था, क्योंकि महपा परमार और चाचा के पुत्र एका ने राणा की शरण में आकर क्षमा माँगी तो कुम्भा ने उन्हें क्षमा कर दिया। कुम्भा जैसा वीर और युद्ध कुशल था, वैसा ही पूर्ण विद्यानुरागी, स्वयं बड़ा विद्वान था। मेवाड़ में ८४ किलों में से कुम्भा ने कुम्भलगढ़ सहित ३२ किलों का निर्माण करवाया। अनेक मन्दिरं, जलाशय और एकलिंग जी मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया। राणा कुम्भा ने राज्य विस्तार किया। आबू को जीतकर अपने राज्य में मिलाया। बूंदी को जीता, सारा हाड़ौती प्रदेश जीतकर अपने राज्य में मिलाया। इस तरह से राणा कुम्भा ने विशाल साम्राज्य स्थापित किया। राणा कुम्भा ने दिल्ली, मालवा और गुजरात के सुल्तानों की संयुक्त सेना को परास्त किया। दिल्ली व गुजरात के सुल्तानों ने छत्र भेंट कर कुम्भा को हिन्दूसुरत्राण' का विरुद प्रदान किया। मालवा के सुल्तान महमूदशाह खिलजी ने राणा कुम्भा पर पाँच बार आक्रमण किए लेकिन हर बार उसे पराजय ही मिली। इसके पश्चात् मालवा और गुजरात के सुल्तानों ने आपसी मेल करके चित्तौड़ पर आक्रमण किया, लेकिन वे परास्त हुए। 
कुम्भा की मृत्यु कुम्भलगढ़ में नामादेव मन्दिर (कुम्भस्वामी) के निकट वि.सं. १५२५ (ई.स. १४६८) में हुई। 
 राजस्थान के भानगढ़ Bhangarh का उजड़ा किला व नगर भूतों का डरावना किले के नाम से देश विदेश में चर्चित है| इस किले की यात्रा के लिए अलवर व जयपुर से सड़क मार्ग द्वारा जाया जा सकता है रेल मार्ग से भी दौसा रेल्वे स्टेशन से उतर कर सड़क मार्ग से इस जगह पहुंचा जा सकता है दौसा से भानगढ़ की दुरी २२ किलोमीटर है| जबकि जयपुर व अलवर दोनों जगहों से लगभग ८० किलोमीटर है|

भानगढ़ के किले व नगर की उजड़ने की कई कहानियां प्रचलित है जिनमें रानी रत्नावती व एक तांत्रिक की कहानी प्रमुख है, प्रचलित जनश्रुतियों में किसी में रत्नावती को भानगढ़ की रानी बताया गया है तो किसी कहानी में भानगढ़ की सुन्दर राजकुमारी| पर दोनों ही कथाओं में इस पात्र के साथ सिंधु सेवड़ा नामक तांत्रिक का नाम व उसका कुकृत्य जरुर जुड़ा है|
प्रचलित कहानी के अनुसार सिंधु देवड़ा महल के पास स्थित पहाड़ पर तांत्रिक क्रियाएँ करता था वह रानी रत्नावती के रूप पर आसक्त था| एक दिन भानगढ़ के बाजार में उसने देखा कि रानी कि एक दासी रानी के लिए केश तेल लेने आई है सिंधु सेवड़ा ने उस तेल को अभिमंत्रित कर दिया कि वह तेल जिस किसी पर लगेगा उसे वह तेल उसके पास ले आएगा| कहते है रानी ने जब तेल को देखा तो वह समझ गई कि यह तेल सिंधु सेवड़ा द्वारा अभिमंत्रित है कहते है रानी भी बहुत सिद्ध थी इसलिए उसने पहचान करली और दासी से उस तेल को तुरंत फैंकने को कहा| दासी ने उस तेल को एक चट्टान पर गिरा दिया| कहते है अभिमंत्रित तेल ने चट्टान को उडाकर सिंधु सेवड़ा की और रवाना कर दिया सिंधु सेवड़ा ने चट्टान देखकर अनुमान लगाया कि रानी उस पर बैठकर उसके पास आ रही सो उसने अभिमंत्रित तेल को रानी को सीधे अपनी छाती पर उतारने का आदेश दिया|

जब चट्टान पास आई तब तांत्रिक को असलियत पता चली तो उसने आनन् फानन में चट्टान उसके ऊपर गिरने से पहले भानगढ़ नगर उजड़ने का शाप दे दिया और खुद चट्टान के नीचे दबकर मर गया| कहते है सिद्ध रानी को यह सब समझते देर ना लगी और उसने तुरंत नगर खाली कराने का आदेश दे दिया| इस तरह यह नगर खाली होकर उजड़ गया और रानी भी तांत्रिक के शाप की भेंट चढ गई|

कितनी सच्चाई है इस कहानी में –

इस कहानी में कितनी सच्चाई है इसके बारे में इस बात से ही जाना जा सकता है कि जनश्रुतियों में भानगढ़ के लिए प्रचलित कहानी में कई लोग रत्नावती को राजकुमारी तो कई लोग रानी बतातें है| रानी रत्नावती का जिक्र तो हर कोई करता है पर वह किस राजा की रानी थी ? 
उसके राजा व उसका शासन काल कौनसा था? 
नगर किस काल में उजड़ा ? 
इस प्रश्नों पर सब चुप है| अक्सर लोग इस नगर व किले को ५०० वर्ष पहले उजड़ा बताते है पर किले से मिले विभिन्न राजाओं के शिलालेखों की तारीख देखने के बाद उसके उजड़ने की समय सीमा काफी कम हो जाती है| हमने अपनी यात्रा में एक मंदिर (शायद मंगला देवी या केशवराय) के गर्भगृह के द्वार पर लगी एक बड़ी शिला पर संवत १९०२ लिखा देखा इस हिसाब से उस मंदिर के निर्माण का काल संवत १९०२ है तो जाहिर है आज से १६७ वर्ष पुर्व यह नगर आबाद था| 

भानगढ़ का इतिहास 

अपने पास उपलब्ध इतिहास की पुस्तकों में मुझे भानगढ़ के बारे में ज्यादा जानकारी तो नहीं मिली पर कुंवर देवीसिंह मंडावा ने अपनी पुस्तक “राजस्थान के कछवाह” में भानगढ़ के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी जरुर दी| अब तक मुझे मिली भानगढ़ के किले की ऐतिहासिक जानकारी के आधार पर भानगढ़ का किला जो आमेर के राजा भगवंतदास ने बनाया था उनके छोटे बेटे माधवसिंह (माधोसिंह) को मिला| भगवंतदास का स्वर्गवास मंगसर सुदी ७ वि.स. १६४६, १५ दिसम्बर १५९० को लाहौर में हुआ था| इसलिए यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि इस समय के आस-पास इस किले की राजगद्दी पर माधवसिंह बैठे थे| इनके अधीन मालपुरा भी था व मुंहता नैणसी के अनुसार अजमेर भी था |माधवसिंह (माधोसिंह) अपने बड़े भाई आमेर के राजा मानसिंह की भांति ही बहुत वीर पुरुष थे उन्होंने शाही सेना में रहते हुए कई महत्वपूर्ण युद्धों में वीरता दिखाकर अपनी वीरता का लोहा मनवाया था| आमेर में इनकी वीरता के बहुत किस्से प्रचलित थे| एक बार वे आमेर आये थे कि आमेर किले के एक झरोखे से अचानक गिरने की वजह से उनकी मृत्यु हो गई| जहाँ उनकी मृत्यु हुई वहां उनका एक स्मारक भी बना है| राजस्थान के इतिहासकार ओझा जी को भानगढ़ में माधवसिंह के दो शिलालेख मिले थे जिन पर माघ बदी एकम वि.स. १६५४ और दूसरे में १६५५ लिखा था| 

माधवसिंह (माधोसिंह) के बाद उनका पुत्र छत्रसाल जिसे छत्रसिंह के नाम से भी जाना जाता है भानगढ़ की गद्दी पर बैठा| छत्रसिंह अपने दो पुत्रों भीमसिंह व आनंद सिंह के साथ दक्षिण में शाही सेना से बगावत करने वाले खानजहाँ लोदी से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे| छत्रसिंह का एक पुत्र अजबसिंह भी था जिसने भानगढ़ के पास ही अजबगढ़ नाम से एक नगर बसाया और वहां किला बनवाया| अजबसिंह ने बलख युद्ध में अप्रत्याशित वीरता दिखाई थी| छत्रसिंह का भानगढ़ में मिले एक शिलालेख में आषाढ़ बदी १३ वि.स.१६७६ अंकित मिला है| छत्रसिंह का एक पुत्र उग्रसेन भी था पर गद्दी पर कौन बैठा उसका पता मेरे पास उपलब्ध पुस्तकों में नहीं मिला| पर भानगढ़ में मिले एक अन्य शिलालेख में माघ बदी एकम वि.स.१७२२ में इसी वंश का एक वंशज हरिसिंह गद्दी पर बैठा|

हरिसिंह के दो बेटे या उसके वंश के दो बेटे औरंगजेब के काल में मुसलमान बन गए थे जिनका नाम मोहम्मद कुलीज व मोहम्मद दहलीज था जिन्हें भानगढ़ राज्य मिला था इन दोनों भाइयों का एक शिलालेख भानगढ़ में मिला है जिस पर जेठ सुदी १४ १७५६ अंकित है| इन दोनों भाइयों के मुसलमान बनने व दिल्ली में मुग़ल सत्ता के कमजोर होने का फायदा उठाते हुए आमेर के महाराजा सवाई जयसिंह ने इन दोनों भाइयों को मारकर भानगढ़ पर कब्ज़ा कर लिया था और इस राज्य को अपने अधीन कर माधवसिंह(माधोसिंह) के ही वंशजों को अपने अधीन जागीरदार बना दिया|

कुछ अनुतरित प्रश्न 

महाराजा सवाई जयसिंह जी द्वारा अपने अधीन करने के बाद इस किले का कौन कौन जागीरदार रहा? 
किले का प्रबंध व नियंत्रण किस जागीरदार के हाथों में रहा ? 
रानी रत्नावती जिसके बारे में कहा जाता है कि वह पास के ही एक गांव तीतरवाडा की रहने वाली थी किस जागीरदार की रानी थी ?
नगर कब और क्यों उजड़ा ? 
ऐसी कौनसी परिस्थितयां रही होगी कि जयपुर आमेर के शक्तिशाली शासकों के अधीन रहते हुए यह संपन्न और समृद्ध नगर वीरान हो उजड़ गया ?
पुरा शहर और महल उजड़ गया सभी निर्माण जमींदोज हुए पर वहां बने मंदिर सुरक्षित कैसे रहे ? 
ऐसे कई प्रश्न है जिनके निवारण के लिए शोध की आवश्यकता है| एक समय समृद्ध रहे भानगढ़ नगर के इतिहास को आपके लोगों के सामने रख सकूँ इसकी मैं पुरी कोशिश करूँगा| 

सिंधु सेवड़ा द्वारा नगर का नाश व भूतों का सच 

इस किले व नगर के उजड़ने के संबंध प्रचलित कहानियों व जन-श्रुतियों की ऊपर चर्चा की जा चुकी है पर किले व नगर को देखने के बाद आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि किले व नगर का नाश किसी चट्टान द्वारा नहीं किया गया है बल्कि नगर उजड़ जाने व खाली हो जाने के कई वर्षों बाद तक आस-पास के ग्रामीणों व अन्य लोगों द्वारा खाली पड़ी इमारतों से जरुरत का सामान निकालने के चक्कर में इमारतें खंडहर में तब्दील हुई है वही किले व महलों को उनमें गड़े धन को निकालने के लिए चोरों द्वारा खुदाई करने के चलते नुक्सान पहुंचा है साथ ही पर्यटकों द्वारा भी नगर व महल की टूटी दीवारों पर चढ़ने के कारण नुकसान पहुंचा है|

मजे की बात यह है कि नगर में बनी हवेलियाँ व बाजार में बनी दुकानें खंडहर में तब्दील हो गई पर भानगढ़ नगर में बने प्राचीन मंदिर वैसे के वैसे सुरक्षित है हाँ उनकी मूर्तियां जरुर गायब है| यदि प्राकृतिक विपदा या तांत्रिक द्वारा अपनी शक्ति से नगर का उजड़ना माना जाय तो फिर मंदिर कैसे बच गए ?
बात साफ है एक तो मंदिरों में लगे दरवाजे आदि घरों में इस्तेमाल लायक नहीं फिर लोग मंदिरों का देवताओं के डर से नुक्सान पहुँचाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते|
किले व उजड़े नगर में भूतों की बात की सच्चाई जानने के लिए आजतक की ने टीम पैरानार्मल उपकरणों व कैमरों के साथ पुरी रात किले में भ्रमण कर गुजारी उन्हें न तो कोई भूत ही मिला न उनके उपकरणों ने कोई ऐसी बात दर्ज की कि जिसके सहारे वहां भूत होने की पुष्टि हो|

हमने भी अपनी यात्रा के दौरान वहां तैनात पुरातत्व विभाग के कर्मचारी से भूतों के अस्तित्व पर चर्चा की तो कर्मचारी ने बताया कि वहां कुल नौ कर्मचारी ऐसे है जिन्हें तीन तीन की टोली में तीन शिफ्टों में किला परिसर की सुरक्षा में तैनात रहना पड़ता है और रात्री गश्त भी वे करते है| रात्री गश्त करते समय उन्होंने कभी वहां भूत होने का अहसास नहीं हुआ और न ही उन्हें कभी डर लगा हाँ जंगल होने की वजह से जंगली जानवरों का डर जरुर है जिसके लिए उन्हें सतर्क व चौकन्ना रहना पड़ता है| 

आजतक व जी टीवी के कार्यक्रम में भी कर्मचारी साथ थे तब भी उन्होंने कोई भूत नहीं देखा उसके बावजूद आजतक के इस खुलासे के बाद कि किले में कोई भूत नहीं है जी टीवी वालों ने भूत होने की झूंठी कहानी प्रचारित की जिसे महज जी टीवी द्वारा अपनी टीआरपी की भूख मिटाने का हथकंडा मात्र कहा जा सकता है|

नोट : यहाँ क्लिक कर आजतक द्वारा की जाँच पड़ताल का वीडियो देखा जा सकता है, जिसमे आजतक ने भानगढ़ किले में भूतों की कहानी को बेपर्दा किया|