Saturday, 31 October 2015


1 राजस्‍थान का प्रवेश द्वार किसे कहा जाता है
भरतपुर
2 महुआ के पेङ पाये जाते है
अदयपुर व चितैङगढ
3 राजस्‍थान में छप्‍पनिया अकाल किस वर्ष पङा
1956 वि स
4 राजस्‍थान में मानसून वर्षा किस दिशा मे बढती है
दक्षिण पश्चिम से उत्‍तर पूर्व
5 राजस्‍थान में गुरू शिखर चोटी की उचाई कितनी है
1722 मीटर
6 राजस्‍थान में किस शहर को सन सिटी के नाम से जाना जाता है
जोधपुर को
7 राजस्‍थान की आकति है
विषमकोण चतुर्भुज
8 राजस्‍थान के किस जिले का क्षेत्रफल सबसे ज्‍यादा है
जैसलमेर
9 राज्‍य की कुल स्‍थलीय सीमा की लम्‍बाई है
5920 किमी
10 राजस्‍थान का सबसे पूर्वी जिला है
धौलपुर
11 राजस्‍थान का सागवान कौनसा वक्ष कहलाता है
रोहिङा
12 राजस्‍थान के किसा क्षेत्र में सागौन के वन पाये जाते है
दक्षिणी
13 जून माह में सूर्य किस जिले में लम्‍बत चमकता है
बॉसवाङा
14 राजस्‍थान में पूर्ण मरूस्‍थल वाले जिलें हैंा
जैसलमेर, बाडमेर
15 राजस्‍‍थान के कौनसे भाग में सर्वाधिक वर्षा होती है
दक्षिणी-पूर्वी
16 राजस्‍थान में सर्वाधिक तहसीलोंकी संख्‍या किस जिले में है
जयपुर
17 राजस्‍थान में सर्वप्रथम सूर्योदय किस जिले में होता है
धौलपुर
18 उङिया पठार किस जिले में स्थित है
सिरोही
19 राजस्‍थान में किन वनोंका अभाव है
शंकुधारी वन
20 राजस्‍थान के क्षेत्रफल का कितना भू-भाग रेगिस्‍तानी है
लगभग दो-तिहाई
21 राजस्‍थान के पश्चिम भाग में पाये जाने वाला सर्वाधिक विषैला सर्प
पीवणा सर्प
22 राजस्‍थान के पूर्णतया वनस्‍पतिरहित क्षेत्र
समगॉव (जैसलमेर)
23 राजस्‍थान के किस जिले में सूर्यकिरणों का तिरछापन सर्वाधिक होता है
श्रीगंगानगर
24 राजस्‍थान का क्षेतफल इजरायल से कितना गुना है
17 गुना बङा है
25 राजस्‍थान की 1070 किमी लम्‍बी पाकिस्‍तान से लगीसिमा रेखा का नाम
रेडक्लिफ रेखा
26 कर्क रेखा राजस्‍थान केकिस जिले से छूती हुई गुजरती है
डूंगरपुर व बॉसवाङा से होकर
27 राजस्‍थान में जनसंख्‍या की द़ष्टि से सबसे बङा जिला
जयपुर
28 थार के रेगिस्‍तान के कुल क्षेत्रफल का कितना प्रतिशत राजस्‍थान में है
58 प्रतिशत
29 राजस्‍थान के रेगिस्‍तान में रेत के विशाल लहरदार टीले को क्‍या कहते है
धोरे
30 राजस्‍थान का एकमात्र जीवाश्‍म पार्क स्थित है
आकलगॉव (जैसलमेर)


राजस्‍थान का भौगोलिक स्‍वरूप

राजस्‍थान सामान्‍य ज्ञान - राजस्‍थान का भौगोलिक स्‍वरूप
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राजस्‍थान के प्राक़तिक विभाग
1 पूर्वी राजस्‍थान – जयपुर, दौसा, अलवर, धौलपुर, सवाई माधोपुर, भरतपुर, टोंक, सीकर, अजमेर व करौली
2 दक्षिण-पूर्वी राजस्‍थान – कोटा, बारां, बूंदी एवं झालावाङ
3 दक्षिण राजस्‍थान – उदयपुर, राजसमंद, भीलवाङा, चितौङगढ, डूंगरपुर व बांसवाङा
4 पश्चिमी राजस्‍थान – जैसलमेर, नारौग, जोधपुर, बाङमेर, जालौर, सिरोही व पाली
5 उत्‍तरी राजस्‍थान – बीकानेर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ व चुरू

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राजस्‍थान की प्रमुख नदियों का वर्गीकरण
1 अरब सागर की ओर बहने वाली नदियां – लूणी, माही, सोम, जाखम, साबरमती व प बनास
2 गंगा-यमुना दोआब की ओर बहने वाली नदियां – चम्‍बल, बनास, काली सिन्‍ध, कोठारी, खारी, मेज, मोरेल, बाणगंगा और गम्‍भीर
3 आन्‍तरिक प्रवाह वाली नदियां – घग्‍घर, सोता-साहिबी, काकणी, मेढां, खण्‍डेर, कांटली नदी

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राज्‍य की प्रमुख नदियों की लम्‍बाई

1 माही नदी – 576 किमी
2 लूणी नदी – 320 किमी
3 चम्‍बल नदी – 966 किमी
4 बाणगंगा नदी – 380 किमी
5 कोठारी नदी – 145 किमी

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राजस्‍थान की झीलों का वर्गीकरण

1 मीठे पानी की झीलें – जयसमंद, राजसमंद, पिछोला, आनासागर, फतेहसागर, उदयसागर, उम्‍मेदसागर, फांयसागर, गैब सागर, सिलीसेढ, कोलायत, पुष्‍कर, बालसमन्‍द, नक्‍की व नवलखा आदि
2 खारे पानी की झीलें – सांभर, पचपद्रा, डीडवाना, फलौदी, कावोद, लूणकरणसर, कछेर व तालछापर

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राजस्‍थान में वर्षा जल संग्रहण के उपाय

1 टांका – ये सामान्‍यत चूना, ईंट, पत्‍थर से मकानों के तलघर में बने हुए छोटे हौज होते है, यह पानी पीने के काम लिया जाता है
2 खङीन – मरूस्‍थली भागों में यह एक मंद ढाल वाला ढालू मैदान होता है, पानी सूखने के बाद इसकी दलदली मिट्टी मे रबी की फसल बोई जाती है
3 बाबङियां – बावङियों का निर्माण गांवों या शहरों के समीप किया जाता है जिनमें वर्षा का पानी इकट्ठा होता रहता है,
4 नाडी – ये छोटे-छोटे कच्‍चे तालाब होते हे तथा गांव के बाहर निचले किनारे पर बनाये जाते है
5 सागर व तालाब – इनके जल का उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता है

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राजस्‍थान के प्रमुख जल प्रपात
1 चूलिया जल प्रपात – चम्‍बल नदी
2 भीमताल जल प्रपात – मांगली नदी

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राजस्‍थान की नदियों के उपनाम
1 चम्‍बल नदी – उप नाम कामधेनु, चर्मण्‍वती
2 बाणगंगा – अर्जुन की गंगा
3 बनास – वन की आशा
4 घग्‍घर – म़त नदी
5 माही – बागङ की गंगा

राजस्थान के लोकवाद्य (Rajasthani Instruments)


राजस्थान के लोकवाद्य
(Rajasthani Instruments)
मानव जीवन संगीत से हमेशा से जुड़ा रहा है। संगीत मानव के विकास के साथ पग-पग पर उपस्थित रहा है। विषण्ण ह्मदय को आह्मलादित एवं निराश मन को प्रतिपल प्रफुल्लित रखने वाले संगीत का अविभाज्य अंग है- विविध-वाद्य यंत्र। इन वाद्यों ने संगीत की प्रभावोत्पादकता को परिवर्धित किया और उसकी संगीतिकता में चार चाँद लगाए हैं। भांति-भाँति के वाद्ययंत्रों के सहयोगी स्वर से संगीत की आर्कषण शक्ति भी विवर्किद्धत हो जाती है।
भारतीय संगीत में मारवाड़ में मारवाड़ के विविध पारंपरिक लोक-वाद्य अपना अनूठा स्थान रखते हैं। मधुरता, सरसता एवं विविधता के कारण आज इन वाद्यों ने राष्ट्रीय ही नहीं, अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान कायम की है। कोई भी संगीत का राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय समारोह या महोत्सव ऐसा नहीं हुआ, जिसमें मरु प्रदेश के इन लोकवाद्यों को प्रतिनिधत्व न मिला है।
मारवाडी लोक-वाद्यों को संगीत की दृष्टि से पॉच भागों में विभाजित किया जा सकता है- यथातत, बितत, सुषिर, अनुब व धन। ताथ वाद्यों में दो प्रकार के वाद्य आते हैं- अनुब व धन।
अनुब में चमडे से मढे वे वाद्य आते हैं, जो डंडे के आधात से बजते हैं। इनमें नगाडा, घूंसा, ढोल, बंब, चंग आदि मुख्य हैं।
लोहा, पीतल व कांसे के बने वाधों को धन वाध कहा जाता है, जिनमें झांझ, मजीरा, करताल, मोरचंगण श्रीमंडल आदि प्रमुख हैं।
तार के वाधों में भी दो भेद हैं- तत और वितत। तत वाद्यों में तार वाले वे साज आते हैं, जो अंगुलियों या मिजराब से बजाते हैं। इनमें जंतर, रवाज, सुरमंडल, चौतारा व इकतारा है। वितत में गज से बजने वाले वाद्य सारंगी, सुकिंरदा, रावणहत्था, चिकारा आदि प्रमुख हैं। सुषिर वाद्यों में फूंक से बजने वाले वाद्य, यथा-सतारा, मुरली, अलगोजा, बांकिया, नागफणी आदि।
उपरोक्त वाद्यों का संक्षिप्त परिचयात्मक विवरण इस प्रकार है-
ताल वाद्य - राजस्थान के ताल वाद्यों में अनुब वाद्यों की बनावट तीन प्रकार की है यथा -
  • वाद्य जिसके एक तरु खाल मढी जाती है तथा दूसरी ओर का भाग खुला रहता है। इन वाद्यों में खंजरी, चंग, डफ आदि प्रमुख हैं।
  • वे वाद्य जिनका घेरा लकडी या लोहे की चादर का बना होता है एवं इनके दाऍ-बाऍ भाग खाल से मढे जाते हैं। जैसे मादल, ढोल, डेरु डमरु आदि।
  • वे वाद्य जिनका ऊपरी भाग खाल से मढा जाता है तथा कटोरीनुमा नीचे का भाग बंद रहता है। इनमें नगाडा, धूंसौं, दमामा, माटा आदि वाद्य आते हैं। इन वाद्यों की बनावट वादन पद्वदि इस प्रकार है -
  • कमटटामक बंब - इसका आकार लोहे की बड़ी कङाही जैसा होता है, जो लोहे की पटियों को जोङ्कर बनाया जाता है। इसका ऊपरी भाग भैंस के चमड़े से मढा जाता है। खाल को चमड़े की तांतों से खींचकर पेंदे में लगी गोल गिङ्गिड़ी लोहे का गोल घेरा से कसा जाता है। अनुब व घन वाद्यों में यह सबसे बडा व भारी होता है। प्राचीन काल में यह रणक्षेत्र एवं दुर्ग की प्राचीर पर बजाया जाता था। इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले लिए लकड़ी के छोटे गाडूलिए का उपयोग किया जाता है। इसे बजाने के लिए वादक लकड़ी के दो डंडे का प्रयोग करते हैं। वर्तमान में इसका प्रचलन लगभग समाप्त हो गया है। इसके वादन के साथ नृत्य व गायन दोनों होते हैं।
  • कुंडी - यह आदिवासी जनजाति का प्रिय वाद्य है, जो पाली, सिरोही एवं मेवा के आदिवासी क्षेत्रों में बजाया जाता है। मिट्टी के छोटे पात्र के उपरी भाग पर बकरे की खाल मढी रहती है। इसका ऊपरी भाग चार-छः इंच तक होता है। कुंडी के उपरी भाग पर एक रस्सी या चमड़े की पटटी लगी रहती है, जिसे वादक गले में डालकर खड़ा होकर बजाता है। वादन के लिए लकड़ी के दो छोटे गुटकों का प्रयोग किया जाता है। आदिवासी नृत्यों के साथ इसका वादन होता है।
  • खंजरी - लकड़ी का छोटा-सा घेरा जिसके एक ओर खाल मढ़ी रहती है। एक हाथ में घेरा तथा दूसरे हाथ से वादन किया जाता है। केवल अंगुलियों और हथेली का भाग काम में लिया जाता है। घेरे पर मढी खाल गोह या बकरी की होती है। कालबेलिया जोगी, गायन व नृत्य में इसका प्रयोग करते हैं। वाद्य के घेरे बडे-छोटे भी होते है। घेरे पर झांझों को भी लगाया जाता है।
  • चंग - एक लकड़ी का गोल घेरा, जो भे या बकरी की खाल से मढ़ा जाता है। एक हाथ में घेरे को थामा जाता है, दूसरे खुले हाथ से बजाया जाता है। थामने वाले हाथ का प्रयोग भी वादन में होता है। एक हाथ से घेरे के किनारे पर तथा दूसरे से मध्यभाग में आघात किया जाता है। इस वाद्य को समान्यतः होलिकोत्सव पर बजाया जाता है।
  • डमरु - यह मुख्य रुप से मदारियों व जादूगरों द्वारा बजाया जाता है। डमरु के मध्य भाग में डोरी बंघी रहती है, जिसके दोनो किनारों पर पत्थर के छोटे टुकड़े बंधे रहते हैं। कलाई के संचालन से ये टुकड़े डमरु के दोनो ओर मढ़ी खाल पर आघात करते हैं।
  •  - लोहे के गोल घेरे पर बकरे की खाल चढी रहती है। यह खाल घेरे पर मढ़ी नहीं जाती, बल्कि चमड़े की बद्धियों से नीचे की तरफ कसी रहती है। इसका वादन चंग की तरफ होता है। अंतर केवल इतना होता है कि चमडे की बद्धियों को ढ़ील व तनाव देकर ऊँचा-नीचा किया जा सकता है।
  • डेरु - यह बङा उमरु जैसा वाद्य है। इसके दोनों ओर चमङा मढ़ा रहता है, जो खोल से काफी ऊपर मेंडल से जुङा रहता है। यह एक पतली और मुड़ी हुई लकड़ी से बजाया जाता है। इस पर एक ही हाथ से आघात किया जाता है तथा दूसरे हाथ से डोरी को दबाकर खाल को कसा या ढीला किया जाता है। इस वाद्य का चुरु, बीकानेर तथा नागौर में अधिक प्रचलन है। मुख्य रुप से माताजी, भैरु जी व गेगा जी की स्तुति पर यह गायी जाती है।
  • ढाक - यह भी डमरु और डेरु से मिलता-जुलता वाद्य है, लेकिन गोलाई व लंबाई डेरु से अधिक होती है। मुख्य रुप से यह वाद्य गु जाति द्वारा गोढां (बगङावतों की लोककथा) गाते समय बजाया जाता है। झालावाङा, कोटा व बूँदी में इस वाद्य का अधिक प्रचलन है। वादक बैठकर दोनो पैरों के पंजो पर रखकर एक भाग पतली डंडी द्वारा तथा दूसरा भाग हाथ की थाप से बजाते है।
  • ढ़ोल - इसका धेरा लोहे की सीघी व पतली परतों को आपस में जोङ्कर बनाया जाता है। परतों (पट्टियों) को आपस में जोङ्ने के लिये लोहे व तांबे की कीलें एक के बाद एक लगाई जाती है। धेरे के दोनो मुँह बकरे की खाल से ढ़के जाते हैं। मढ़े हुए चमड़े को कसरन के लिए डोरी का प्रयोग किया जाता है। ढोल को चढ़ाने और उतारने के लिए डोरी में लोहे या पीतल के छल्ले लगे रहते हैं। ढोल का नर भाग डंडे से तथा मादा भाग हाथ से बजाया जाता है। यह वाद्य संपूर्ण राजस्थान में त्योहार व मांगलिक अवसरों पर बजाया जाता है। राजस्थान में ढोली, मिरासी, सरगरा आदि जातियों के लोग ढोल बजाने का कार्य करते हैं। ढोल विभित्र अवसरों पर अलग-अलग ढंग से बजाया जाता है, यथा- कटक या बाहरु ढोल, घोङ्चिड़ी रौ ढोल, खुङ्का रौ ढोल आदि।
  • ढोलक - यह आम, बीजा, शीशम, सागौन और नीम की लकड़ी से बनता है। लकड़ी को पोला करके दोनों मुखों पर बकरे की खाल डोरियों से कसी रहती है। डोरी में छल्ले रहते हैं, जो ढोलक का स्वर मिलाने में काम आते हैं। यह गायन व नृत्य के साथ बजायी जाती है। यह एक प्रमुख लय वाद्य है।
  • तासा - तासा लोहे या मिट्टी की परात के आकार का होता है। इस पर बकरे की खाल मढ़ी जाती है, जो चमड़े की पटिटयों से कसी रहती है। गले में लटका कर दो पहली लकड़ी की चपटियों से इसे बजाया जाता है।
  • धूंसौ - इसका घेरा आम व फरास की लकड़ी से बनता है। प्राचीन समय में रणक्षेत्र के वाद्य समूह में इसका वादन किया जाता था। कहीं-कहीं बडे-बडे मंदिरों में भी इकसा वादन होता है। इसका ऊपरी भाग भैंस की खाल से मढ. दिया जाता है। इसकों लकड़ी के दो बडे-डंडे से बजाया जाता है।
  • नगाङा - समान प्रकार के दो लोहे के बड़े कटोरे, जिनका ऊपरी भाग भैंस की खाल से मढा जाता है। प्राचीन काल में घोड़े, हाथी या ऊँट पर रख कर राजा की सवारी के आगे बजाया जाता था। यह मुख्य-मुख्य से मंदिरों में बजने वाला वाद्य है। इन पर लकड़ी के दो डंडों से आघात करके ध्वनि उत्पत्र करते हैं।
  • नटों की ढोलक - बेलनाकृत काष्ठ की खोल पर मढा हुआ वाद्य। नट व मादा की पुडियों को दो मोटे डंडे से आधातित किया जाता है। कभी-कभी मादा के लिए हाथ तथा नर के लिए डंडे का प्रयोग किया जात है, जो वक्रता लिए होता है। इसके साथ मुख्यतः बांकिया का वादन भी होता है।
  • पाबूजी के मोटे - मिट्टी के दो बड़े मटकों के मुंह पर चमङा चढाया जाता है। चमड़े को मटके के मुँह की किनारी से चिपकाकर ऊपर डोरी बांध दी जाती है। दोनों माटों को अलग-अलग व्यक्ति बजाते हैं। दोनों माटों में एक नर व एक मादा होता है, तदनुसार दोनों के स्वर भी अलग होते हैं। माटों पर पाबूजी व माता जी के पावड़े गाए जाते है। इनका वादन हथेली व अंगुलियों से किया जाता है। मुख्य रुप से यह वाद्य जयपुर, बीकानेर व नागौर क्षेत्र में बजाया जाता है।
  • भीलों की मादल - मिट्टी का बेलनाकार घेरा, जो कुम्हारों द्वारा बनाया जाता है। घेरे के दोनो मुखों पर हिरण या बकरें की खाल चढाई जाती है। खाल को घेरे से चिपकाकर डोरी से कस दी जाती है, इसमें छल्ले नही लगते। इसका एक भाग हाथ से व दूसरा भाग डंडे से बजाया जाता है। यह वाद्य भील व गरासिया आदिवासी जातियों द्वारा गायन, नृत्य व गवरी लोकनाट्य के साथ बजाया जाता है।
  • रावलों की मादल - काष्ठ खोलकर मढा हुआ वाद्य। राजस्थानी लोकवाद्यों में यही एक ऐसा वाद्य है, जिसपर पखावज की भांति गट्टों का प्रयोग होता है। दोनों ओर की चमड़े की पुङ्यों पर आटा लगाकर, स्वर मिलाया जाता है। नर व मादा भाग हाथ से बजाए जाते हैं। यह वाद्य केवल चारणों के रावल (चाचक) के पास उपलब्ध है।
धन वाद्य - यह वाद्य प्रायः ताल के लिए प्रयोग किए जाते हैं। प्रमुख वाद्यों की बनावट व आकार-प्रकार इस प्रकार है -
  • करताल - आयताकार लकड़ी के बीच में झांझों का फंसाया जाता है। हाथ के अंगूठे में एक तथा अन्य अंगुलियों के साथ पकड़ लिया जाता है और इन्हें परस्पर आधारित करके लय रुपों में बजाया जाता है। मुख्य रुप से भक्ति एवं धार्मिक संगीत में बजाया जाता है। मुख्य रुप से भक्ति एवं धार्मिक संगीत में इसका प्रयोग होता है।
  •       खङ्ताल - शीशम, रोहिङा या खैर की लकड़ी के चार अंगुल चौड़े दस अंगुल लंबे चिकने व पतले चार टुकड़े। यह दोनो हाथों से बजायी जाती है तथा एक हाथ में दो अफकड़े रहते हैं। इसके वादन में कट-कट की ध्वनी निकलती है। लयात्मक धन वाद्य जो मुख्य रुप से जोधपुर, बाडमेंर व जैसलमेंर क्षेत्रों में मांगणयार लंगा जाति के लोग बजाते हैं।
  •      धुरालियो - बांस की आठ-दस अंगुल लंबी व पतली खपच्ची का बना वाद्य। बजाते समय बॉस की खपच्ची को सावधानी पूर्वक छीलकर बीच के पतले भाग से जीभी निकाली जाती है। जीभी के पिछले भाग पर धागा बंधा रहता है। जीभी को दांतों के बीच रखकर मुखरंध्र से वायु देते हुए दूसरे हाथ से धागे को तनाव व ढील (धीरे-धीरे झटके) द्वारा ध्वनि उत्पत्र की जाती है। यहा वाद्य कालबेलिया तथा गरेसिया जाति द्वारा बजाया जाने वाला वाद्य यंत्र है।
  •     झालर - यह मोटी घंटा धातु की गोल थाली सी होती है। इसे डंडे से आघादित किया जाता है। यह आरती के समय मंदिरों में बजाई जाती है।
  •      झांझ - कांसे, तांबे व जस्ते के मिश्रण से बने दो चक्राकार चपटे टुकङों के मध्य भाग में छेद होता है। मध्य भाग के गड्डे के छेद में छोरी लगी रहती है। डोरी में लगे कपड़े के गुटको को हाथ में पकङ्कर परस्पर आधातित करके वादन किया जाता है। यह गायन व नृत्य के साथ बजायी जाती है।
  •      मंजीरा - दो छोटी गहरी गोल मिश्रित धतु की बनी पट्टियॉ। इनका मध्य भाग प्याली के आकार का होता है। मध्य भाग के गड्ढे के छेद में डोरी लगी रहती है। ये दोनों हाथ से बजाए जाते हैं, दोनों हाथ में एक-एक मंजीरा रहता है। परस्पर आघात करने पर ध्वनि निकलती है। मुख्य रुप से भक्ति एवं धर्मिक संगीत में इसका प्रयोग होता है। काम जाति की महिलाएँ मंजीरों की ताल व लय के साथ तेरह ताल जोडती है।
  •      श्री मंडल - कांसे के आठ या दस गोलाकार चपटे टुकङों। रस्सी द्वारा यह टुकड़े अलग-अलग समानान्तर लकडी के स्टैण्ड पर बंधे होते हैं। श्रीमंडल के सभी टुकडे के स्वर अलग-अलग होते हैं। पतली लकड़ी को दो डंडी से आघात करके वादन किया जाता है। राजस्थानी लोक वाद्यों में इसे जलतरंग कहा जा सकता है।
  •      मोरचंग - लोहे के फ्रेम में पक्के लाहे की जीभी होती है। दांतों के बीच दबाकर, मुखरंध्र से वायु देते हुए जीभी को अंगुली से आघादित करते हैं। वादन से लयात्मक स्वर निकलते हैं। यह वाद्य चरवाहों, घुमक्कङों एवं आदिवासियों में विशेष रुप से प्रचलित वाद्य है।
  •      भपंग - तूंबे के पैंदे पर पतली खाल मढी रहती है। खाल के मध्य में छेद करके तांत का तार निकाला जाता है। तांत के ऊपरी सिरे पर लकड़ी का गुटका लगता है। तांबे को बायीं बगल में दबाकर, तार को बाएँ हाथ से तनाव देते हुए दाहिने हाथ की नखवी से प्रहार करने पर लयात्मक ध्वनि निकलती है।
  •      भैरु जी के घुंघरु - बड़े गोलाकार घुंघरु, जो चमड़े की पट्टी पर बंधे रहते हैं। यह पट्टी कमर पर बाँधी जाती है। राजस्थान में इसका प्रयोग भैरु जी के भोपों द्वारा होता है, जो कमर को हिलाकर इन घुंघरुओं से अनुरंजित ध्वनि निकालते हैं तथा साथ में गाते हैं।
  • सुषिर वाद्य - राजस्थान में सुषिर वाद्य काष्ठ व पीतल के बने होते हैं। जिसमें प्रमुख वाद्यों का परिचयात्मक विवरण इस प्रकार है -
  •      अलगोजा - बांस के दस-बारह अंगुल लंबे टुकड़े, जिनके निचले सिरे पर चार छेद होते हैं। दोनों बांसुरियों को मुंह में लेकर दोनों हाथों से बजाई जाती है, एक हाथ में एक-एक बांसुरी रहती है। दोनों बांसुरियों के तीन छेदों पर अंगुलियाँ रहती हैं। यह वाद्य चारवाहों द्वारा कोटा, बूंदी, भरतपुर व अलवर क्षेत्रों में बजाया जाता है।
  •    करणा - पीतल का बना दस-बारह फुट लंबा वाद्य, जो प्राचीन काल में विजय घोष में प्रयुक्त होता था। कुछ मंदिरों में भी इसका वादन होता है। पिछले भाग से होंठ लगाकर फूँक देने पर घ्वनि निकलती है। जोधपरु के मेहरानगढ़ संग्रहालय में रखा करणा वाद्य सर्वाधिक लंबा है।
  •    तुरही - पीतल का बना आठ-दस फुट लंबा वाद्य, जिसका मुख छोटा व आकृति नोंकदार होती है। होंठ लगाकर फुँकने पर तीखी ध्वनि निकलती है। प्राचीन काल में दुर्ग एवं युद्व स्थलों में इसका वादन होता था।
  •   नड़ - कगोर की लगभग एक मीटर लंबी पोली लकड़ी, जिसके निचले सिरे पर चार छेद होते हैं। इसका वादन काफी कठिन है। वादक लंबी सांस खींखकर फेफङों में भरता है, बाद में न में फूँककर इसका वादन होता है। फूँक ठीक उसी प्राकर दी जाती है, जिस प्रकार कांच की शीशी बजायी जाती है। वादन के साथ गायन भी किया जाता है। वा वाद्य जैसलमेर में मुख्य रुप से बजाया जाता है।
  •   नागफणी - सर्पाकार पीतल का सुषिर वाद्य। वाद्य के मुंह पर होठों द्वारा ताकत से फूँक देने पर इसका वादन होता है। साधुओं का यह एक धार्मिक वाद्य है तथा इसमें से घोरात्मक ध्वनि निकलती है।
  •   पूंगी/बीण - तांबे के निचले भाग में बाँस या लकड़ी की दो जड़ी हुई नलियाँ लगी रहती हैं। दोनो नलियों में सरकंडे के पत्ते की रीठ लगाई जाती है। तांबे के ऊपरी सिरे को होठों के बीच रखकर फूँक द्वारा अनुध्वनित किया जाता है।
  •   बांकिया - पीतल का बना तुरही जैसा ही वाद्य, लेकिन इसका अग्र भाग गोल फाबेदार है। होठों के बीच रखरकर फूंक देने पर तुड-तुड ध्वनि निकलती है। यह वाद्य मांगलिक पर्वो पर बजाया जाता है। इसमें स्वरों की संख्या सीमित होती है।
  • मयंक - एक बकरे की संपूर्ण खाल से बना वाद्य, जिसके दो तरु छेद रहते हैं। एक छेद पर नली लगी रहती है, वादक उसे मुंह में लेकर आवश्यकतानुसार हवा भरता है। दूसरे भाग पर दस-बारह अंगुल लंबी लकड़ी की चपटी नली होती है। नली के ऊपरी भाग पर छः तथा नीचे एक छेद होता है। बगल में लेकर धीरे-धीर दबाने से इसका वादन होता है। जोगी जाति के लोग इस पर भजन व कथा गाते हैं।
  •     मुरला/मुरली - दो नालियों को एक लंबित तंबू में लगाकर लगातार स्वांस वादित इस वाद्य यंत्र के तीन भेद हैं: - आगौर, मानसुरी और टांकी। छोटी व पतली तूंबी पर निर्मित टांकी मुरला या मुरली कहलाती है। श्रीकरीम व अल्लादीन लंगा, इस वाद्य के ख्याति प्राप्त कलाकार हैं। बाड़में क्षेत्र में इस वाद्य का अधिक प्रचलन है। इस पर देशी राग-रागनियों की विभिन्न धुने बजायी जाती है।
  •      सतारा - दो बांसुरियों को एक साथ निरंतर स्वांस प्रक्रिया द्वारा बजाया जाता है। एक बांसुरी केवल श्रुति के लिए तथा दूसरी को स्वरात्मक रचना के लिए काम में लिया जाता है। फिर घी ऊब सूख लकड़ी में छेद करके इसे तैयार किया जाता है। दोनों बांसुरियों एक सी लंबाई होने पर पाबा जोड़ी, एक लंबी और एक छोटी होने पर डोढ़ा जोङा एवं अलगोजा नाम से भी जाना जाता है। यह पूर्ण संगीत वाद्य है तथा मुख्य रुप से चरवाहों द्वारा इसका वादन होता है। यह वाद्य मुख्यतया जोधपुर तथा बाड़मेर में बजाया जाता है।
  •     सिंगा - सींग के आकार का पीपत की चछर का बना वाद्य। पिछले भाग में होंठ लगाकर फूँक देने पर बजता है। वस्तुतः यह सींग की अनुक्रम पर बना वाद्य है, जिसका वादन जोगी व साधुओं द्वारा किया जाता है।
  •    सुरगाई-सुरनाई - दीरी का यह वाद्य ऊपर से पहला व आगे से फाबेदार होता है। इसके अनेक रुप राजस्थान मे मिलते हैं। आदिवासी क्षेत्रों में लक्का व अन्य क्षेत्रों में नफीरी व टोटो भी होते हैं। इसपर खजूर या सरकंडे की पत्ती की रीढ लगाई जाती है। जिसे होंठों के बीच रखकर फूँक द्वारा
   राजस्थान के खनिज             
                             
1 . खनिजों का अजायबघर किस राज्य को कहा जाता है।   
 - राजस्थान
2  . फ्लोराइट खनिज के उत्पादन में राजस्थान का देश में कौनसा स्थान है।  
- प्रथम

3 . अलौह खनिज की दृष्टि से राजस्थान का देश में कौनसा स्थान है।

- प्रथम

4 . लौह खनिज की दृष्टि से राजस्थान का देश में कौनसा स्थान है।
- चौथा

5  . राजस्थान में गुलाबी रंग का ग्रेनाइट कहां पर पाया जाता है।

- जालौर

6  . हरी अग्नि के नाम से जाना जाता है।

- पन्ना

7  . राजस्थान में फैल्सपारकहां पाया जाता है।
- अजमेर(ब्यावर) व भीलवाड़ा
8  . सुपर जिंक समेल्टर संयत्र (ब्रिटेन के सहयोग से) कहां पर स्थापित किया गया है।
- चंदेरिया(चित्तौड़गढ़)
9  . राजस्थान में सोना कहां पर पाया जाता है।
- बांसवाड़ा व डूंगरपुर
10  . हीरा राजस्थान में कहां पाया जाता है।
- केसरपुरा (चित्तौड़गढ़)
11  . देश में नमक उत्पादन की दृष्टि से राजस्थान कौनसेस्थान पर है।
- चौथा
12  . राजस्थान में जेम स्टोन औद्योगिक पार्क किसजिले में स्थित है।
- जयपुर

13  . राजस्थान में सर्वाधिकऔद्योगिक इकाइयां किस जिले में स्थापित हैं।

- जयपुर

14  . राजस्थान में शून्य उद्योग जिले कौनसे हैं।

- जैसलमेर, बाड़मेर, चूरू व सिरोही
15  . जिप्सम राजस्थान में सर्वाधिक कहां पर पाया जाता है।
- नागौर
16  . राजस्थान में चांदी की खान कहां पर स्थित है।
- जावर (उदयपुर), रामपुरा-आंगुचा (भीलवाड़ा)
17  . मैंगनीज राजस्थान के किस जिलों में पाया जाता है।
- बांसवाड़ा व उदयपुर
18  . वरमीक्यूलाइट राजस्थान में कहां पर पाया जाता है।
- अजमेर
19  . राजस्थान में मैग्नेसाइट कहां पर उत्पादित किया जाता है।
- अजमेर

20  . राजस्थान में वोलस्टोनाइट कहां पाया जाता है।

- सिरोही व डूंगरपुर

21  . यूरेनियम राजस्थान मेंकहां पर पाया जाता है।

- उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा व सीकर
22  . अभ्रक राजस्थान में सर्वाधिक कहां पर पाया जाता है।
- भीलवाड़ा व उदयपुर
23  . सीसा-जस्ता उत्पादन में राजस्थान का देश में कौनसा स्थान है।
- प्रथम
24  . रॉक फास्फेट के राजस्थान में प्रमुख स्थान कौनसे हैं।
- झामर कोटड़ा (उदयपुर) व बिरमानियां (जैसलमेर)
25  . मुल्तानी मिट्टी राजस्थान में कहां पाई जाती है।
- बीकानेर व बाड़मेर
26  . पाइराइट्स राजस्थान में सर्वाधिक कहां पाया जाता है।
- सलादीपुर (सीकर)
27  . राजस्थान में बेराइट्सके विशाल भंडार कहां पाये गए हैं।
- जगतपुर (उदयपुर)
28  . घीया पत्थर राजस्थान में कहां पाया जाता है।
- भीलवाड़ा व उदयपुर
29  . राजस्थान में कैल्साइटकहां पाया जाता है।
- सीकर व उदयपुर
30.   भारत का प्रथम तेल शोधन संयंत्र कहां पर स्थित है।
- डिग्बोई (असोम)

विश्व की                                                               प्रसिद्ध नदियाँ

नदी का नाम
उद्‍गम
समापन
लंबाई
नील
Nile
विक्टोरिया झील आफ्रीका
Lake Victoria, Africa
भूमध्य सागर
Mediterranean Sea
6,690
अमेजान
Amazon
ग्लैशियर फेड झील, पेरु
Glacier-fed lakes, Peru
अटलांटिक महासागर
Atlantic Ocean
6,296
मिसीसिपी मिसौरी
Mississippi Missouri
रेड रॉक, मोन्टाना
Red Rock, Montana
मैक्सिको की खाड़ी
Gulf of Mexico
5,970
चांग जियांग
Chang Jiang
तिब्बत का पठाऱ, चीन
Tibetan plateau, China
चीन सागर
China Sea
5,797


ओब
Ob
अल्ताई पर्वत, रूस
Altai Mts., Russia
ओब की खाड़ी
Gulf of Ob
5,567
हुआंग हे
Huang He
कुलान पर्वत, चीन
Kunlan Mts.,
West China
चिली की खाड़ी
Gulf of Chihli
4,667
येनिसेइ
Yenisei
टान्नु ओला पर्वत, रूस
Tannu-Ola Mts Russia
आर्कटिक महासागर
Arctic Ocean
4,506
पराना
Parana
परानैबा-ग्रांड नदी संगम
Paranaiba-Grande confluence
रिओ डि ला प्लाटा
Rio de la Plata
4,498
इर्टिश
Irtish
अल्ताई पर्वत, रूस
Altai Mts., Russia
ओब नदी
Ob River
4,438
ज़ैरे (कांगो)
Zaire (Congo)
लुआलाब-लुआपुला संगम
Lualab-Luapula confluence
अटलांटिक महासागर
Atlantic Ocean
4,371
हेइलांग (आमुर)
Heilong (Amur)
शिल्का-आर्गुन संगम
Shilka-Argunrivers confluence
टाटर स्ट्रेट
Tatar Strait
4,352
लेना
Lena
बैकल पर्वत, रूस
Baikal Mts., Russia
आर्कटिक महासागर
Arctic Ocean
4,268
मैकेंजी
Mackenzie
फिनले नदी, कनाडा
Finlay River Canada
ब्यूफोर्ट सागर
Beaufort Sea
4,241

नाइजर
Niger
गुएना
Guinea
गुएना की खाड़ी
Gulf of Guinea
4,184
मेकॉंग
Mekong
तिब्बत की पहाड़ियाँ
Tibetan highlands
दक्षिण चीन सागर
South China Sea
4,023
मिस्सीसिप्पी
Mississippi
इटास्का झील, मिनेसोटा
Lake Itasca, Minnesota
मैक्सिको की खाड़ीGulf of Mexico 3,779
मिसौरी
Missouri
जैफर्सन-मैडिसन संगम, मोन्टाना
Jefferson-Madison confluence, Montana
मिस्सीसिप्पी नदी
Mississippi River
3,726
व्होल्गा
Volga
वल्दाई का पठार, रूस
Valdai plateau, Russia
कैस्पियन सागर
Caspian Sea
3,687
मैडेइरा
Madeira
बेनी-मौमोर संगम
Beni-Maumoré confluence
अमेजान नदी
Amazon River
3,238
पुरुस
Purus
पेरुवियन एन्डेस
Peruvian Andes
अमेजान नदी
Amazon River
3,207
सो फ्रांसिस्को
São Francisco
दक्षिणपूर्व मिनास, ब्राजील
Southwest Minas Brazil
अटलांटिक महासागर
Atlantic Ocean
3,198
युकोन
Yukon
लेवेस-पेल्ली संगम, कनाडा
Lewes-Pelly confluence Canada
बेरिंग सागर
Bering Sea
3,185

सेंट लॉरेंस
St. Lawrence
ओंटारियो झील
Lake Ontario
सेंट लॉरेंस की खाड़ी
Gulf of St. Lawrence
3,058
रियो ग्रैंड
Rio Grande
सन जौन पर्वत
San Juan Mts., Colorado
मैक्सिको की खाड़ी
Gulf of Mexico
3,034
ब्रह्मपुत्र
Brahmaputra
हिमालय
Himalayas
गंगा नदी
Ganges River
2,897
सिंधु
Indus
हिमालय
Himalayas
अरब सागर
Arabian Sea
2,897
डानुब
Danube
ब्लैक फॉरेस्ट, जर्मनी
Black Forest, Germany
काला सागर
Black Sea
2,842
यूफ्रेट्स
Euphrates
मुराट नेहारी-कारा सु संगमMurat Nehri-Kara confluence Turkey शाट-अल-अरब
Shatt-al-Arab
2,799
डॉर्लिंग
Darling
पूर्वी पर्वतमाला, आस्ट्रेलिया
Eastern Highlands, Australia
मुर्रे नदी
Murray River
2,739
जाम्बेजी
Zambezi
11°21′S, 24°22′E, Zambia मोजाम्बिक चैनल
Mozambique Channel
2,736
टोकांटिन्स
Tocantins
गोइस, ब्राजील
Goiás, Brazil
पार नदी
Pará River
2,699
मुर्रे
Murray
आस्ट्रेलियन एल्प्स
Australian Alps
हिंद महासागर
Indian Ocean
2,589
नेल्सन
Nelson
बो नदी, कनाडा
Bow River Canada
हड्सन की खाड़ी
Hudson Bay
2,575
पारागुआ
Paraguay
माटो ग्रोसो
Mato Grosso, Brazil
पराना नदी
Paraná River
2,549
उराल
Ural
उराल पर्वत, रूस
Ural Mts., Russia
कैस्पियन सागर
Caspian Sea
2,533
गंगा
Ganges
हिमालय
Himalayas
बंगाल की खाड़ी
Bay of Bengal
2,506

Country And Currency


Different Country And Their Currency


विभिन्न देश और उनकी मुद्राएँDifferent Country And Their Currency


देशमुद्राएँ
आस्ट्रियाशिलिंग
बेल्जियमबेल्जियन फ्रैंक
बुल्गारियालेव
डेनमार्कड्राचमा
फिनलैंडमार्का
फ़्रांसफ्रैंक
चेकोस्लावियाक्राउन
जर्मनीड्यूश मार्क
इंग्लैण्डपौंड
हंगरीफारिन्ट्स
ग्रीसड्राचमा
इटलीलीरा
माल्टापाउंड
हालैंडगिल्डर
नार्वेक्रोन
पोलैंडजोलटी
पुर्तगालशिलिंग
रोमानियाफ्लोरिन
रूसरूबल
स्पेनपेसेटा
स्विट्ज़रलैंडस्विस फ्रैंक
युगोस्लावियायुगोस्लाव दीनार
अमरीकाडॉलर
मैक्सिकोपैसो
अर्जेंटीनापैसो
ब्राज़ीलक्रुजेरो
चिलीएसयूडर
कोलंबियापैसो
पेरूसोल
ईरानरियाल
तुर्कीलीरा
मिश्रइजिप्शियन पौंड
इथोपियाइथोपियन डॉलर
कीनियाशिलिंग
मोरक्कोदिरहम
नाईज़ीरियाशिलिंग
दक्षिण अफ्रीकारेंड
तंज़ानियाशिलिंग
युगांडाशिलिंग
अफगानिस्तानबहट
म्यांमारक्यात
श्री लंकारूपी
इंडोनेशियारुपैया
जापानयेन
दक्षिण कोरियावॉन
पाकिस्तानरूपी
थाईलैंडबहट
आस्ट्रेलियाडॉलर
न्यूज़ीलैंडडॉलर

War of the Indian History


भारतीय इतिहास के प्रमुख युद्ध
.पू.
३२६ हाईडेस्पीज का युद्ध : सिकंदर और पंजाब के राजा पोरस के बीच जिसमे सिकंदर की विजय हुई |
२६१ कलिंग की लड़ाई : सम्राट अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया था और युद्ध के रक्तपात से विचलित होकरउन्होंने युद्ध  करने की कसम खाई |
ईस्वी
७१२ – सिंध की लड़ाई में मोहम्मद कासिम ने अरबों की सत्ता स्थापित की |
११९१ – तराईन का प्रथम युद्ध – मोहम्मद गौरी और पृथ्वी राज चौहान के बीच हुआ था | चौहान की विजय हुई |
११९२ -तराईन का द्वितीय युद्ध – मोहम्मद गौरी और पृथ्वी राज चौहान के बीचइसमें मोहम्मद गौरी की विजयहुई |
११९४ -चंदावर का युद्ध – इसमें मुहम्मद गौरी ने कन्नौज के राजा जयचंद को हराया |
१५२६ -पानीपत का प्रथम युद्ध -मुग़ल शासक बाबर और इब्राहीम लोधी के बीच |
१५२७ -खानवा का युद्ध – इसमें बाबर ने राणा सांगा को पराजित किया |
१५२९ -घाघरा का युद्ध -इसमें बाबर ने महमूद लोदी के नेतृत्व में अफगानों को हराया |
१५३९ – चौसा का युद्ध – इसमें शेरशाह सूरी ने हुमायु को हराया |
१५४० – कन्नौज (बिलग्राम का युद्ध) : इसमें फिर से शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को हराया  भारत छोड़ने पर मजबूरकिया |
१५५६ – पानीपत का द्वितीय युद्ध :अकबर और हेमू के बीच |
१५६५ – तालीकोटा का युद्ध : इस युद्ध से विजयनगर साम्राज्य का अंत हो गया क्यूंकि बीजापुर,बीदर,अहमदनगर  गोलकुंडा की संगठित सेना ने लड़ी थी |
१५७६ – हल्दी घाटी का युद्ध : अकबर और राणा प्रताप के बीचइसमें राणा प्रताप की हार हुई |
१७५७ – प्लासी का युद्ध : अंग्रेजो और सिराजुद्दौला के बीचजिसमे अंग्रेजो की विजय हुई और भारत में अंग्रेजीशासन की नीव पड़ी |
१७६० – वांडीवाश का युद्ध : अंग्रेजो और फ्रांसीसियो के बीचजिसमे फ्रांसीसियो की हार हुई |
१७६१ -पानीपत का तृतीय युद्ध :अहमदशाह अब्दाली और मराठो के बीच | जिसमे फ्रांसीसियों की हार हुई |
१७६४ -बक्सर का युद्ध : अंग्रेजो और शुजाउद्दौलामीर कासिम एवं शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना के बीचअंग्रेजो की विजय हुई | अंग्रेजो को भारत वर्ष में सर्वोच्च शक्ति माना जाने लगा |
१७६७-६९ – प्रथम मैसूर युद्ध : हैदर अली और अंग्रेजो के बीचजिसमे अंग्रेजो की हार हुई |
१७८०-८४ – द्वितीय मैसूर युद्ध : हैदर अली और अंग्रेजो के बीचजो अनिर्णित छूटा |
१७९० – तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध : टीपू सुल्तान और अंग्रेजो के बीच लड़ाई संधि के द्वारा समाप्त हुई |
१७९९ – चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध : टीपू सुल्तान और अंग्रेजो के बीच , टीपू की हार हुई और मैसूर शक्ति का पतनहुआ |
१८४९ – चिलियान वाला युद्ध : ईस्ट इंडिया कंपनी और सिखों के बीच हुआ था जिसमे सिखों की हार हुई |
१९६२ – भारत चीन सीमा युद्ध : चीनी सेना द्वारा भारत के सीमा क्षेत्रो पर आक्रमण | कुछ दिन तक युद्ध होने केबाद एकपक्षीय युद्ध विराम की घोषणा | भारत को अपनी सीमा के कुछ हिस्सों को छोड़ना पड़ा |
१९६५ – भारत पाक युद्ध : भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जिसमे पाकिस्तान की हार हुई | फलस्वरूपबांग्लादेश एक स्वतन्त्र देश बना |
१९९९ -कारगिल युद्ध : जम्मू एवं कश्मीर के द्रास और कारगिल क्षेत्रो में पाकिस्तानी घुसपैठियों को लेकर हुएयुद्ध में पुनः पाकिस्तान को हार का सामना करना पड़ा और भारतीयों को जीत मिली |